top of page

मानव शरीर पर कम विकिरण, आपदा में बेहतर संचार—शिव कुमार सिंह के शोध ने दिखाई नई राह

लेखक की तस्वीर: Uttarakhandnews Network
Uttarakhandnews Network
1 दिन पहले
2 मिनट पठन

हरिद्वार। चारधाम यात्रा के दौरान भूस्खलन, बादल फटने, अचानक बाढ़ और नदी के तेज बहाव जैसी आपदाओं में लापता यात्रियों की पहचान और तलाश में भविष्य में वियरेबल संचार तकनीक मददगार साबित हो सकती है। गुरुकुल कांगड़ी सम विश्वविद्यालय के अभियांत्रिकी एवं प्रौद्योगिकी संकाय के इलेक्ट्रॉनिक्स एंड कम्युनिकेशन इंजीनियरिंग विभाग के युवा वैज्ञानिक एवं शोधार्थी शिव कुमार सिंह ने “डिजाइन ऑफ वियरेबल एंटीना फॉर वायरलेस बॉडी एरिया नेटवर्क” विषय पर शोध करते हुए छोटे आकार के ऐसे एंटीना की डिजाइन और उपयोगिता पर कार्य किया है, जिसे कपड़ों अथवा पहनने योग्य उपकरणों में लगाया जा सकता है।


शोध डॉ. तनुज कुमार गर्ग के निर्देशन तथा डॉ. अतुल कुमार वार्ष्णेय के सह-निर्देशन में किया गया। शोधार्थी के अनुसार उत्तराखंड जैसे दुर्गम पर्वतीय क्षेत्रों में आपदा के दौरान शरीर से जुड़े संचार उपकरण के माध्यम से व्यक्ति की पहचान और उसकी स्थिति से संबंधित आवश्यक सूचना उपलब्ध कराने की संभावनाएं बढ़ सकती हैं। शोध में एंटीना का आकार छोटा रखने के साथ मानव शरीर पर पड़ने वाले विकिरण के प्रभाव को कम करने पर विशेष ध्यान दिया गया है।


कपड़ों और वियरेबल डिवाइस में हो सकेगा इस्तेमाल


शिव कुमार सिंह ने बताया कि विकसित लघु एंटीना को कपड़ों, पहनने योग्य उपकरणों और अन्य वियरेबल सामग्री में लगाया जा सकता है। इसका संभावित उपयोग आपदा प्रबंधन, रेस्क्यू ऑपरेशन और वायरलेस बॉडी एरिया नेटवर्क में किया जा सकता है। वहीं शोध निर्देशक डॉ. तनुज कुमार गर्ग के अनुसार सुरक्षा एवं रक्षा क्षेत्र में भी इस तकनीक की संभावनाएं हैं। सीमावर्ती क्षेत्रों में सैनिकों की वर्दी या उपकरणों में ऐसे एंटीना लगाए जाने से आपात स्थिति में उनकी पहचान और खोज में सहायता मिल सकती है।


वाई-फाई के साथ ब्लूटूथ कनेक्टिविटी पर भी जोर


सह-निर्देशक डॉ. अतुल कुमार वार्ष्णेय ने बताया कि शोध के दौरान एंटीना को वाई-फाई और ब्लूटूथ दोनों संचार माध्यमों के साथ कार्य करने की दिशा में विकसित करने पर ध्यान दिया गया। आपदा प्रभावित अथवा दुर्गम क्षेत्रों में वाई-फाई कनेक्टिविटी बाधित होने की स्थिति में ब्लूटूथ आधारित संचार संभावित विकल्प के रूप में उपयोगी हो सकता है। शोधकर्ताओं के अनुसार यह तकनीक भविष्य में आपदा के दौरान यात्रियों, रेस्क्यू कर्मियों और सुरक्षा बलों की संचार एवं लोकेशन संबंधी जरूरतों में सहायक हो सकती है।

 
 
bottom of page