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‘गोल्डन ऑवर’ में फैसला बनेगा जीवनरक्षक, हिम्स जौलीग्रांट में आधुनिक नवजात श्वसन प्रबंधन पर मंथन

लेखक की तस्वीर: Uttarakhandnews Network
Uttarakhandnews Network
6 घंटे पहले
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देहरादून/डोईवाला। नवजात शिशु के जन्म के बाद का पहला घंटा महज समय की एक इकाई नहीं, बल्कि उसकी जिंदगी के लिए निर्णायक खिड़की है। सांस लेने में कठिनाई की समय पर पहचान, ऑक्सीजन का संतुलित उपयोग और जरूरत पड़ने पर तत्काल सीपीएपी सपोर्ट उपलब्ध कराना नवजात मृत्यु दर को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसी संवेदनशील पहलू को केंद्र में रखते हुए हिम्स जौलीग्रांट के नियोनेटोलॉजी विभाग ने उत्तराखंड नियोनेटोलॉजी सोसायटी के तत्वावधान में उत्तराखंड नियोकॉन-2026 के तहत नवजात शिशुओं में ऑक्सीजन सपोर्ट एवं सीपीएपी पर एक दिवसीय कार्यशाला आयोजित की।


स्वामी राम हिमालयन विश्वविद्यालय के स्किल्स एंड सिमुलेशन सेंटर में आयोजित कार्यशाला में चिकित्सकों और नर्सिंग स्टाफ को नवजातों में श्वसन संकट की पहचान से लेकर आधुनिक श्वसन सहायता तकनीकों के व्यावहारिक उपयोग तक का प्रशिक्षण दिया गया। कार्यशाला में 38 चिकित्सकों, रेजिडेंट डॉक्टरों एवं नर्सिंग स्टाफ ने हिस्सा लिया।


एसआरएचयू के प्रति कुलपति डॉ. ए.के. देवराड़ी ने कहा कि नवजात मृत्यु दर कम करने के लिए प्रभावी और समयबद्ध श्वसन प्रबंधन बेहद जरूरी है। कई बार जानकारी के अभाव में नवजात को आवश्यकता से अधिक ऑक्सीजन दे दी जाती है या जरूरत के समय सीपीएपी जैसी श्वसन सहायता उपलब्ध नहीं हो पाती। कार्यशाला का उद्देश्य इसी चिकित्सकीय गैप को कम करना है, ताकि उचित उपचार के अभाव में किसी नवजात की जिंदगी खतरे में न पड़े।


पीजीआईएमईआर चंडीगढ़ के डॉ. प्रवीण कुमार ने नवजातों में रेस्पिरेटरी डिस्ट्रेस की समय रहते पहचान को उपचार की पहली और महत्वपूर्ण कड़ी बताया। उन्होंने कहा कि जन्म के बाद का पहला घंटा ‘गोल्डन ऑवर’ है, जिसमें लिया गया सही निर्णय नवजात के जीवन की दिशा तय कर सकता है। सुरक्षित ऑक्सीजन उपयोग और सही श्वसन प्रबंधन के जरिए गंभीर जटिलताओं को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है।


नियोनेटोलॉजी विभाग के डॉ. चिन्मय चेतन ने बताया कि कार्यशाला को महज व्याख्यान तक सीमित न रखते हुए हैंड्स-ऑन एवं प्रैक्टिकल आधारित बनाया गया। प्रतिभागियों को ऑक्सीजन थेरेपी, सीपीएपी के उचित उपयोग, नवजात श्वसन संकट की पहचान तथा आधुनिक रेस्पिरेटरी मैनेजमेंट तकनीकों का प्रशिक्षण दिया गया।


कार्यशाला में इंटरैक्टिव लेक्चर और ओपन डिस्कशन के साथ प्रतिभागियों के ज्ञान का आकलन करने के लिए कहूट आधारित पोस्ट-टेस्ट भी कराया गया। विशेषज्ञों ने इस दौरान इस बात पर विशेष जोर दिया कि नवजात को ऑक्सीजन देना जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी उसका सुरक्षित और नियंत्रित उपयोग भी है।


कार्यशाला के सफल आयोजन में डॉ. पूनम सिंह, डॉ. भाग्यश्री पी.आर., डॉ. दीक्षा गुप्ता, डॉ. तल्हा रहमान, डॉ. रवलीन कौर, डॉ. नरेंद्र शर्मा एवं अंबिका नेगी का सहयोग रहा।

 
 
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