top of page

मानसिक स्वास्थ्य को मिली नई आवाज़, हिमालयन अस्पताल में जुटे देशभर के विशेषज्ञ

  • लेखक की तस्वीर: Uttarakhandnews Network
    Uttarakhandnews Network
  • 22 मई
  • 2 मिनट पठन

डोईवाला/देहरादून। चिकित्सा केवल शरीर के उपचार तक सीमित नहीं है, बल्कि मन की स्थिरता और भावनात्मक संतुलन भी उसके उतने ही महत्वपूर्ण आयाम हैं। इसी विचार को केंद्र में रखते हुए हिमालयन अस्पताल, जौलीग्रांट परिसर स्थित हिमालयन कॉलेज ऑफ नर्सिंग (एचसीएन) में “क्रिएटिंग कल्चर ऑफ मेंटल वेलनेस” विषय पर राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। यह आयोजन ट्रेन्ड नर्सेस एसोसिएशन उत्तराखंड शाखा एवं मानसिक स्वास्थ्य नर्सिंग विभाग के संयुक्त तत्वावधान में संपन्न हुआ।


देश के विभिन्न राज्यों से आए नर्सिंग विशेषज्ञों, शिक्षकों, स्टाफ नर्सों, शोधार्थियों और विद्यार्थियों की उपस्थिति ने इस आयोजन को केवल एक शैक्षणिक कार्यक्रम नहीं रहने दिया, बल्कि इसे मानसिक स्वास्थ्य के भविष्य को लेकर एक गंभीर राष्ट्रीय विमर्श का स्वरूप प्रदान किया।


कार्यक्रम की मुख्य अतिथि लेफ्टिनेंट कर्नल इंदिरां ने कहा कि स्वास्थ्य सेवाओं की वास्तविक गुणवत्ता केवल आधुनिक संसाधनों से नहीं, बल्कि उन लोगों की मानसिक और भावनात्मक स्थिति से तय होती है जो सेवा दे रहे हैं। उन्होंने कहा कि आज स्वास्थ्यकर्मियों के भीतर आत्मबल, भावनात्मक स्थिरता और सहयोगात्मक कार्य संस्कृति विकसित करना समय की अनिवार्यता है।


वक्ताओं ने अपने विचारों में इस बात पर विशेष बल दिया कि मानसिक स्वास्थ्य को अब अलग विषय नहीं, बल्कि दैनिक चिकित्सा सेवाओं और नर्सिंग शिक्षा का मूल तत्व बनाया जाना चाहिए। डॉ. संचिता पुगाजंडी ने मानसिक स्वास्थ्य को स्वास्थ्य प्रणाली के केंद्र में रखने की आवश्यकता बताई, जबकि डॉ. कैथलीन ने कहा कि करुणा, संवेदनशीलता और पारस्परिक सहयोग से ही मानसिक रूप से सशक्त कार्य संस्कृति विकसित की जा सकती है।


विशेषज्ञ वक्ताओं ने मानसिक स्वास्थ्य के अनेक आयामों पर अपने अनुभव साझा किए। उमेश शर्मा ने जीवन की व्यस्तता के बीच मानसिक संतुलन बनाए रखने के व्यावहारिक उपाय बताए। एकता राव ने सकारात्मक सोच की ऊर्जा पर प्रकाश डाला, वहीं शैलजा शर्मा ने कार्यस्थलों को मानसिक रूप से अनुकूल बनाने की आवश्यकता रेखांकित की। चेतना ने कहा कि मानसिक स्वास्थ्य जागरूकता के विस्तार में नर्सिंग समुदाय की भूमिका निर्णायक है।


संगोष्ठी में डॉ. ग्रेस मैडोना सिंह ने मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े सामाजिक पूर्वाग्रहों को समाप्त करने की आवश्यकता पर जोर देते हुए कहा कि सहायता मांगना कमजोरी नहीं, बल्कि सजगता का संकेत है। डॉ. राजेश शर्मा ने कहा कि बढ़ते दबाव और चुनौतियों के बीच स्वास्थ्य सेवाओं को मानवीय बनाए रखने के लिए भावनात्मक मजबूती को प्राथमिकता देनी होगी।


उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, पंजाब, दिल्ली, असम और जम्मू-कश्मीर सहित विभिन्न राज्यों से कुल 314 प्रतिभागियों ने ऑनलाइन एवं ऑफलाइन माध्यम से सहभागिता की। कार्यक्रम के सफल संचालन एवं आयोजन में नीतिका भट्ट, हीना नेगी, दिव्या गौर, अर्पिता बाली और आकांक्षा की महत्वपूर्ण भूमिका रही।

 
 
bottom of page